भारत का शराब उद्योग ब्रिटेन के साथ व्यापार समझौते में बल्क स्कॉच पर शुल्क को लेकर स्पष्टता चाहता है
वर्गीकरण पर सीमा शुल्क विवाद से उन खेपों पर कम शुल्क का लाभ प्रभावित हो सकता है, जिनका स्कॉच आयात में हिस्सा लगभग 80% है
मंगलवार, 3 नवंबर 2026

भारत के मादक पेय उद्योग ने सोमवार, 2 नवंबर को वाणिज्य मंत्रालय से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या बल्क स्कॉच व्हिस्की के आयात पर भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते के तहत कम सीमा शुल्क लागू होता है। उद्योग का कहना है कि टैरिफ वर्गीकरण को लेकर अनिश्चितता देश में आने वाली स्कॉच की बड़ी मात्रा की खेपों को प्रभावित कर रही है।
उद्योग प्रतिनिधियों ने कहा कि ब्लेंडिंग और बोतलबंदी के लिए भारत लाई जाने वाली पात्र बल्क स्कॉच को भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (CETA) के तहत तय टैरिफ प्रतिबद्धताओं में शामिल किया जाना चाहिए, बशर्ते आयातित उत्पाद निर्धारित परिभाषाओं और मूल-स्थान के नियमों पर खरे उतरें। यह मांग ऐसे समय आई है जब राजस्व खुफिया एजेंसी के अधिकारियों ने कुछ शराब कंपनियों से जानकारी मांगी है और आयात दस्तावेजों तथा संबंधित रिकॉर्ड की समीक्षा के लिए कुछ कार्यालयों का दौरा किया है।
विवाद इस बात पर है कि सीमा शुल्क के लिहाज से बल्क स्कॉच का वर्गीकरण कैसे किया जाए। उद्योग संगठनों का तर्क है कि इसे अध्याय 22, शीर्षक 2208 के तहत रखा जाना चाहिए, जिसमें स्पिरिट और व्हिस्की शामिल हैं। उनका कहना है कि इसे शीर्षक 2106 के तहत नहीं रखा जाना चाहिए, जो अन्यत्र निर्दिष्ट न किए गए खाद्य पदार्थों की व्यापक अवशिष्ट श्रेणी है। उद्योग का पक्ष है कि स्कॉच व्हिस्की ही रहती है, चाहे उसका आयात खुदरा बोतलों में हो या बड़े कंटेनरों में, जिनमें मौजूद व्हिस्की को बाद में भारत में ब्लेंड और बोतलबंद किया जाना हो।
यह अंतर इसलिए अहम है क्योंकि व्यापार समझौते में व्हिस्की के लिए विशेष टैरिफ व्यवस्था है। 15 जुलाई से लागू हुए CETA के तहत भारत ने पात्र स्कॉच व्हिस्की पर मूल सीमा शुल्क पहले वर्ष में 150% से घटाकर 75% कर दिया। अगले 10 वर्षों में इसे और घटाकर 40% किया जाना है। समझौते में दो लीटर से बड़े कंटेनरों में आयातित व्हिस्की और दो लीटर तक के खुदरा पैक के लिए अलग-अलग टैरिफ लाइनें हैं। उद्योग की व्याख्या के अनुसार, बल्क स्कॉच HS 2208 30 92 के तहत आती है, जबकि खुदरा बोतलें HS 2208 30 12 के तहत।
उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि इस मुद्दे का व्यापक व्यावसायिक महत्व है, क्योंकि मात्रा के लिहाज से स्कॉटलैंड से आने वाले स्कॉच व्हिस्की आयात का लगभग 80% हिस्सा बल्क खेपों का है। कई भारतीय शराब कंपनियां इन आयातों का इस्तेमाल ब्लेंडिंग और बोतलबंदी में करती हैं। इनमें कंपनी की अपनी रेसिपी के तहत बनाई जाने वाली भारत-निर्मित व्हिस्की भी शामिल हैं। इसलिए सीमा शुल्क व्यवस्था में किसी भी बदलाव से आयात लागत, कीमतों और बल्क स्पिरिट पर निर्भर स्थानीय उत्पादन इकाइयों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
उद्योग की चिंता है कि यदि सीमा शुल्क अधिकारी पात्र बल्क स्कॉच का वर्गीकरण व्हिस्की वाले शीर्षक के बजाय HS 2106 के तहत करते हैं, तो ये आयात व्यापार समझौते में स्कॉच के लिए तय विशेष टैरिफ रियायतों के दायरे से बाहर हो सकते हैं। इससे कंपनियों पर समझौते के लागू होने के समय की अपेक्षा अधिक शुल्क का बोझ पड़ सकता है।
कर और व्यापार विशेषज्ञों ने कहा कि वर्गीकरण के सवाल के सीधे वित्तीय परिणाम होंगे। Nangia Global में अप्रत्यक्ष कर के कार्यकारी निदेशक शिवकुमार रामजी ने कहा कि तरजीही शुल्क का लाभ आयातित उत्पाद के सटीक वर्गीकरण पर निर्भर करता है। उन्होंने बताया कि HSN 22071011 के तहत वर्गीकृत मादक पेय कंसन्ट्रेट पर शुरुआती तरजीही शुल्क 110% है, जबकि HSN 22083012 और 22083092 के तहत आने वाली तैयार स्कॉच व्हिस्की पर यह 75% है। उद्योग विशेषज्ञों द्वारा उद्धृत शुल्क-सारणी के तहत कंसन्ट्रेट पर शुल्क घटकर 75% होगा, जबकि तैयार व्हिस्की की दर आगे की नौ कटौतियों में घटकर 40% होनी है।
Global Trade Research Initiative के अजय श्रीवास्तव ने कहा कि समझौते में बल्क स्कॉच आयात को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है और टैरिफ लाभ केवल खुदरा बोतलों तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि खुदरा और बल्क, दोनों श्रेणियां कम दरों के लिए पात्र हो सकती हैं, यदि वे समझौते में तय मूल-स्थान के नियमों का पालन करती हैं। यह अहम है, क्योंकि मौजूदा असहमति केवल कंटेनर के आकार को लेकर नहीं, बल्कि इस बात को लेकर भी है कि आयातित उत्पाद समझौते में दर्ज टैरिफ लाइन और मूल-स्थान की शर्तों से मेल खाता है या नहीं।
श्रीवास्तव ने कहा कि समझौते का टैरिफ-हेडिंग में बदलाव वाला नियम पात्र उत्पाद के लिए निर्धारित टैरिफ बदलाव को पूरा करना जरूरी बनाता है। उन्होंने यह भी कहा कि आयातित उच्च-अल्कोहल वाले स्पिरिट या न्यूट्रल ग्रेन स्पिरिट को केवल पतला करना और बोतलबंद करना, अपने आप में, ब्रिटेन का मूल-स्थान साबित नहीं करता। समझौते के तहत स्कॉच व्हिस्की के रूप में पात्र होने के लिए उत्पाद को स्कॉच से जुड़ी मूल शर्तें भी पूरी करनी होंगी, जिनमें स्कॉटलैंड में आसवन और परिपक्वन शामिल हैं।
भारतीय स्पिरिट उत्पादकों के लिए मंत्रालय का जवाब यह तय कर सकता है कि भविष्य में सीमा पर खेपों का आकलन कैसे होगा और कंपनियां खरीद तथा ब्लेंडिंग से जुड़े फैसले किस तरह लेंगी। चूंकि आयात की गई मात्रा का अधिकांश हिस्सा बल्क खेपों का है, इसलिए वर्गीकरण के फैसले का स्कॉटलैंड और भारत के बीच व्यापार प्रवाह तथा स्थानीय बोतलबंदी और व्हिस्की ब्लेंडिंग इकाइयों की लागत पर सीधा असर पड़ सकता है।