जंगली अंगूर का जीन आम अंगूर की बेल को डाउनी मिल्ड्यू से बचाने में मददगार

शोधकर्ताओं के अनुसार, इस खोज से प्रजनकों को एक नया लक्ष्य मिला है, जो आगे चलकर अंगूर के बागों में फसल-संरक्षण उपचारों की जरूरत घटा सकता है

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

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जंगली अंगूर का जीन आम अंगूर की बेल को डाउनी मिल्ड्यू से बचाने में मददगार

शोधकर्ताओं ने अंगूर कुल के जीनोम का गुणसूत्र-स्तर पर मानचित्रण किया है और जंगली अंगूर की बेल में रोग-प्रतिरोध का एक ऐसा जीन पहचाना है, जिसने प्रयोगशाला परीक्षणों में खेती वाले अंगूर की बेल को डाउनी मिल्ड्यू से बचाने में मदद की। यह रोग अंगूर के बागों में भारी नुकसान का कारण बनता है।

Nature Plants में प्रकाशित इस अध्ययन में Vitaceae के विकास का परीक्षण किया गया—इस पादप कुल में खेती वाले अंगूर और उनके जंगली संबंधी शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने कहा कि कृषि और मानव समाजों के लिए अंगूर के महत्व के बावजूद, इस कुल का विकासवादी इतिहास अब तक स्पष्ट नहीं रहा है। इसे समझने के लिए उन्होंने गुणसूत्र-स्तर के जीनोम असेंबली तैयार किए और इनके आधार पर कुल की विभिन्न प्रजातियों की तुलना की।

अध्ययन के सबसे व्यावहारिक निष्कर्षों में से एक जंगली प्रजाति Vitis bellula से जुड़ा है। टीम ने VbRpv35 नाम का रोग-प्रतिरोधी जीन पहचाना और बताया कि जब इस जीन को Vitis vinifera में सक्रिय किया गया—यह वह प्रजाति है जिससे दुनिया के अधिकांश वाइन अंगूर मिलते हैं—तो डाउनी मिल्ड्यू के प्रति प्रतिरोध बढ़ गया। यह नतीजा अंगूर की बेलों को अधिक लचीला बनाने के उद्देश्य से किए जाने वाले प्रजनन और जैव-प्रौद्योगिकी कार्यों के लिए एक संभावित नया लक्ष्य सामने रखता है।

इसका महत्व पादप आनुवंशिकी से कहीं आगे तक हो सकता है। डाउनी मिल्ड्यू उन रोगों में से एक है, जिनके कारण अंगूर के बागों को फसल-संरक्षण उपचारों पर काफी निर्भर रहना पड़ सकता है। यदि यह जीन प्रजनन कार्यक्रमों में उपयोगी साबित होता है, तो आगे चलकर यह वाइन, अंगूर के रस और अंगूर से बने अन्य पेय पदार्थों की आपूर्ति करने वाले बागों में रसायनों का इस्तेमाल और उत्पादन का जोखिम घटाने में मदद कर सकता है। हालांकि, व्यावसायिक प्रभाव आगे के परीक्षणों, प्रजनन और नियामकीय प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।

लेख में किया गया व्यापक जीनोमिक अध्ययन इस बात से जुड़े बुनियादी सवालों पर भी रोशनी डालता है कि अंगूर के निकट संबंधी समय के साथ कैसे विकसित हुए। शोधकर्ताओं ने अंगूर कुल के लगभग 7 करोड़ वर्षों के विकासकाल में फैली प्रजातियों का विश्लेषण किया। उनके फाइलोजीनोमिक नतीजों के अनुसार, Ampelopsis का संबंध Parthenocissus और Vitis से अधिक निकट है। इससे इस कुल की प्रमुख शाखाओं के आपसी संबंधों की तस्वीर अधिक स्पष्ट होती है।

टीम ने कैरियोटाइप में बदलावों का भी पता लगाया—यानी गुणसूत्रों की संख्या और उनकी व्यवस्था में होने वाले बदलाव। विश्लेषण में पाया गया कि Vitis समूह में गुणसूत्रों की व्यवस्था अपेक्षाकृत स्थिर रही है। इस समूह में खेती वाले अंगूर और अंगूर की कई जंगली प्रजातियां शामिल हैं। इसके उलट, कुल की दो अन्य वंश-रेखाओं Tetrastigma और Cissus में गुणसूत्रों की व्यापक पुनर्व्यवस्था देखी गई। इससे संकेत मिलता है कि कुल की कुछ शाखाओं में जीनोम की संरचना अधिक स्थिर रही, जबकि अन्य में बड़े बदलाव हुए।

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ‘पैन-3D जीनोम’ का भी विश्लेषण किया। इस तरीके में केवल DNA अनुक्रमों की तुलना नहीं की जाती, बल्कि यह भी देखा जाता है कि कोशिका के केंद्रक के भीतर जीनोम किस तरह मुड़ा और व्यवस्थित हुआ है। लेख के अनुसार, संरचनात्मक रूपांतर—यानी जीनोम में बड़े बदलाव, जैसे किसी हिस्से का जुड़ना, हटना या पुनर्व्यवस्थित होना—A/B कम्पार्टमेंट और टोपोलॉजिकली एसोसिएटेड डोमेन में अंतर के लिए जिम्मेदार थे। इन दोनों विशेषताओं का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया जाता है कि गुणसूत्र तीन आयामों में कैसे व्यवस्थित हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि इन डोमेन की सीमाओं पर संरचनात्मक रूपांतर कम आम थे। इससे संकेत मिल सकता है कि जीनोम की संरचना के कुछ हिस्सों पर अधिक कड़े विकासवादी प्रतिबंध लागू होते हैं।

अध्ययन का एक और प्रमुख हिस्सा NLR जीनों पर केंद्रित था। ये पादप प्रतिरक्षा जीनों का एक वर्ग हैं, जो रोगजनकों की पहचान करने में शामिल होते हैं। शोधकर्ताओं ने बताया कि Helitron ट्रांसपोसॉन—जीनोम के भीतर स्थान बदल सकने वाले DNA तत्व—ने Vitis में इन रोग-प्रतिरोधी जीनों की संख्या बढ़ाने और उनकी अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने में भूमिका निभाई। सरल शब्दों में, अध्ययन का संकेत है कि चलायमान DNA के कुछ हिस्सों ने विकास के लंबे दौर में अंगूर की बेल की प्रतिरक्षा प्रणाली के एक हिस्से को आकार दिया।

ट्रांसपोसॉन और प्रतिरोधी जीनों के बीच यह संबंध महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे केवल जीनों की सूची नहीं, बल्कि उनके पीछे की प्रक्रिया भी सामने आती है। पादप प्रजनक और आनुवंशिकीविद अक्सर यह समझना चाहते हैं कि जीनों के कुछ परिवारों का विस्तार क्यों होता है, उनका नियंत्रण कैसे होता है और उपयोगी आनुवंशिक विविधता कहां से आती है। लेख का तर्क है कि अंगूर की बेल के प्रतिरोधी जीनों के मामले में Helitron इस प्रक्रिया की प्रमुख ताकत थे। इससे शोधकर्ताओं को जंगली प्रजातियों में रोग-प्रतिरोध के नए स्रोत अधिक कुशलता से खोजने में मदद मिल सकती है।

ये निष्कर्ष फसल-विज्ञान में जंगली संबंधी प्रजातियों को उपयोगी गुणों के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने की व्यापक कोशिशों से भी मेल खाते हैं। खेती की अंगूर बेलें उच्च गुणवत्ता वाले फल दे सकती हैं, लेकिन वे अक्सर रोगों के प्रति संवेदनशील होती हैं। जंगली प्रजातियों में ऐसे जीन हो सकते हैं जो घरेलूकरण के दौरान खो गए हों, कम हो गए हों या कभी घरेलू किस्मों में मौजूद ही न रहे हों। अंगूर कुल की कई प्रजातियों के विस्तृत जीनोम असेंबली तैयार करके शोधकर्ताओं ने ऐसा संसाधन बनाया है, जिससे इन गुणों को खोजना और उन्हें प्रजनन कार्यक्रमों में शामिल करना आसान हो सकता है।

लेख के अनुसार, इस अध्ययन से मिले जीनोमिक संसाधनों का उद्देश्य अंगूर की बेलों को बेहतर बनाने के साथ-साथ पुष्पीय पौधों के विकास पर व्यापक शोध को सहयोग देना भी है। जर्नल में प्रकाशित लेख के अलावा, शोधकर्ताओं ने कच्चा अनुक्रमण डेटा और जीनोम असेंबली सार्वजनिक रिपॉजिटरी में जमा किए हैं। इसके साथ ही, उन्होंने जीनोम के एनोटेशन और पूर्वजों के गुणसूत्रों के अनुमानित मॉडल भी उपलब्ध कराए हैं, ताकि अन्य वैज्ञानिक आगे के शोध में इनका उपयोग कर सकें।

अंगूर की खेती के लिहाज से तत्काल नतीजा बागों में लगाने के लिए तैयार कोई नई किस्म नहीं, बल्कि आनुवंशिकी के क्षेत्र में मिला एक मजबूत सुराग है। पहचाना गया VbRpv35 जीन अब अलग-अलग आनुवंशिक पृष्ठभूमियों और उगाने की परिस्थितियों में सत्यापन के लिए संभावित उम्मीदवार है। वहीं, अंगूर कुल का व्यापक तुलनात्मक मानचित्र प्रजनकों को यह समझने में मदद करता है कि उपयोगी प्रतिरोधी गुण कहां मिल सकते हैं।

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