स्कॉच आयात वर्गीकरण को लेकर भारत में Diageo और Pernod Ricard की जांच
अधिकारी जांच रहे हैं कि क्या कुछ थोक खेपों को समझौते के तहत शुल्क में 150% से घटाकर 75% किए जाने का अनुचित लाभ मिला
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

मामले से परिचित उद्योग जगत के पांच सूत्रों के अनुसार, भारतीय कर अधिकारी यह जांच रहे हैं कि क्या Pernod Ricard और Diageo की स्कॉच व्हिस्की की कुछ थोक खेपों का वर्गीकरण इस तरह किया गया था कि उन्हें भारत और ब्रिटेन के बीच हुए नए व्यापार समझौते के तहत कम सीमा शुल्क का लाभ मिल सके।
यह जांच किसी नई शुल्क वृद्धि के बराबर नहीं है और न ही इससे किसी कंपनी की ओर से नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है। इसका केंद्र यह सवाल है कि 15 जुलाई 2026 को द्विपक्षीय व्यापार समझौता लागू होने के बाद प्रभावी हुई कम शुल्क दर के लिए किस तरह के स्कॉच आयात पात्र हैं। पात्र आयातों पर शुल्क 150% से घटकर 75% हो गया—यानी 75 प्रतिशत अंक की कमी। पात्र खेपों के लिए शुल्क दर में यह 50% की कटौती है, न कि उपभोक्ता के लिए अंतिम कीमत में 50% की गिरावट।
यह जांच अहम है, क्योंकि Pernod और Diageo भारत के शराब बाजार के बड़े आपूर्तिकर्ता हैं और दोनों ही उन उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली स्कॉच का आयात करते हैं जिन्हें स्थानीय स्तर पर मिश्रित कर बेचा जाता है। यदि भारतीय अधिकारी तय करते हैं कि स्कॉच की कुछ थोक खेपें या सांद्रित रूप कम दर के पात्र नहीं हैं, तो इन सामग्रियों की आयात लागत बढ़ सकती है और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण स्पिरिट बाजारों में से एक में कीमतों तथा मुनाफे पर असर पड़ सकता है।
मामले से परिचित तीन सूत्रों के अनुसार, भारतीय राजस्व खुफिया निदेशालय के अधिकारियों ने पिछले सप्ताह नई दिल्ली के पास Pernod के भारत स्थित मुख्यालय का दौरा किया और अधिकारियों से स्कॉच आयात के बारे में पूछताछ की। राजस्व खुफिया निदेशालय, जिसे DRI के नाम से जाना जाता है, भारत की वह एजेंसी है जो तस्करी, अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक धोखाधड़ी और सीमा शुल्क की चोरी से निपटने के लिए जिम्मेदार है।
Diageo की भारतीय इकाई United Spirits ने पिछले सप्ताह स्टॉक एक्सचेंज में दाखिल सूचना में कहा कि अधिकारियों ने शुक्रवार को कई स्थानों पर उसके कार्यालयों की तलाशी ली। कंपनी ने इसे उद्योगव्यापी अभियान बताया। सूचना में तलाशी का विषय नहीं बताया गया। दो सूत्रों ने कहा कि स्कॉच के कुछ आयातों के वर्गीकरण को लेकर Diageo की भी जांच हो रही है।
मामले से परिचित चार लोगों के अनुसार, मुख्य सवाल यह है कि क्या भारत-ब्रिटेन समझौते के तहत शुल्क में राहत उन स्कॉच सांद्रकों पर लागू होती है जिन्हें कंटेनरों में भारत लाया जाता है और बाद में स्थानीय स्तर पर बेचे जाने वाले ब्रांडों के लिए अन्य सामग्रियों के साथ मिलाया जाता है। एक सूत्र ने कहा कि अधिकारियों को चिंता है कि स्कॉच की कुछ थोक खेपों का वर्गीकरण इस तरह किया गया हो सकता है कि वे कम शुल्क के पात्र बन गई हों, जबकि अधिकारियों की राय में वे इसके पात्र न हों।
किसी भी कंपनी पर सार्वजनिक रूप से गलत काम करने का आरोप नहीं लगाया गया है और इस जांच के सिलसिले में कर की किसी नई मांग की राशि तय नहीं की गई है।
Pernod Ricard ने कहा कि वह DRI के साथ सहयोग कर रही है और मांगी गई जानकारी दे रही है। पेरिस स्थित फ्रांसीसी समूह ने कहा कि वह अधिकारियों के किसी भी सवाल का जवाब देने के लिए प्रतिबद्ध है। Pernod दुनिया के सबसे बड़े वाइन और स्पिरिट उत्पादकों में से एक है और करीब 160 देशों में अपने ब्रांड बेचती है।
Diageo ने भी कहा कि वह भारतीय अधिकारियों के साथ सहयोग कर रही है और उसने हमेशा स्थानीय कानूनों का पालन किया है। स्टॉक एक्सचेंज में दाखिल सूचना में United Spirits ने कहा कि उसने अधिकारियों को दस्तावेज और स्पष्टीकरण दिए हैं। लंदन स्थित Diageo खुद को दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय स्पिरिट कंपनी बताती है और कहती है कि उसके उत्पाद करीब 180 देशों में वितरित किए जाते हैं।
भारतीय राजस्व खुफिया एजेंसी ने टिप्पणी के अनुरोध का जवाब नहीं दिया।
यह मामला भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जुड़े शुल्क और सीमा-शुल्क विवादों की लंबी कड़ी में एक और उदाहरण है। विदेशी कंपनियों ने अक्सर शिकायत की है कि वर्गीकरण और मूल्यांकन से जुड़े मामले सालों तक खुले रह सकते हैं और बाद में उनसे पुराने करों की बड़ी मांग उठ सकती है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि वे कानून लागू कर रहे हैं और राजस्व की रक्षा कर रहे हैं।
स्पिरिट कंपनियों के लिए यह सवाल खास महत्व रखता है, क्योंकि भारत शराब का विशाल और तेजी से बढ़ता बाजार है। Pernod Ricard और Diageo देश के अनुमानित $65 billion के शराब उद्योग की बड़ी कंपनियां हैं। दोनों भारत में बेचे जाने वाले प्रीमियम और सेमी-प्रीमियम उत्पादों के लिए आयातित स्कॉच पर निर्भर हैं। इनमें स्थानीय मिश्रण भी शामिल हैं, जिनमें स्कॉच एक घटक के तौर पर इस्तेमाल होती है।
उद्योग के शोधकर्ताओं ने भारत के आयातित स्पिरिट बाजार में ब्रिटेन के महत्व की ओर ध्यान दिलाया है। Crisil Ratings ने इस साल कहा कि भारत के आयातित स्पिरिट खंड में ब्रिटेन की हिस्सेदारी करीब 75% है, जिसका बड़ा कारण स्कॉच व्हिस्की है। इससे नए शुल्क रियायत का दायरा आयातकों, वितरकों और घरेलू बॉटलरों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाता है।
जुलाई में व्यापार समझौता लागू होने पर ब्रिटिश सरकार ने कहा था कि व्हिस्की और जिन समेत ब्रिटेन के प्रतिष्ठित उत्पादों को भारत के शुल्क बदलावों से लाभ होगा। सरकार ने यह भी कहा था कि 2022 में भारत को ब्रिटेन का व्हिस्की निर्यात £200 million से अधिक का था। मौजूदा जांच इस रियायत के अस्तित्व पर सवाल नहीं उठाती। यह जांच करती है कि कम शुल्क कितने व्यापक रूप से लागू होना चाहिए, खासकर उन थोक या सांद्रित आयातों पर जिनका बाद में स्थानीय उत्पादन में इस्तेमाल होता है।
Pernod के कार्यालय के दौरे से परिचित एक व्यक्ति ने कहा कि निरीक्षकों ने कंपनी के भारत स्थित मुख्यालय में अपने दौरे के दौरान स्कॉच की थोक खेपों से जुड़े दस्तावेजों की समीक्षा की थी और उसके बाद उनसे कोई संपर्क नहीं हुआ। सूत्र ने इस कार्रवाई को नए व्यापार ढांचे के तहत सीमा-शुल्क व्यवहार पर केंद्रित बताया, न कि किसी घोषित दंड से जुड़ी कार्रवाई।
यह जांच भारत में दोनों समूहों के लिए संवेदनशील समय पर हो रही है। देश में प्रतिस्पर्धा-विरोधी मामलों से पहले ही जूझ रही Pernod के लिए भारत मात्रा के लिहाज से उसका सबसे बड़ा बाजार है। कंपनी $314 million की एक अलग पुराने कर की मांग को भी चुनौती दे रही है, जो कुछ आयातों का कम मूल्यांकन किए जाने के आरोपों से जुड़ी है। कंपनी ने उस मामले में गलत काम करने से इनकार किया है। दूसरी ओर, Diageo ने अगस्त में अपने कुछ सबसे चर्चित पेय पदार्थों की विधि में बदलाव करने पर सहमति दी थी। भारत के खाद्य सुरक्षा नियामक ने कुछ राज्यों में इन पर प्रतिबंध लगा दिया था, क्योंकि अधिकारियों ने कहा था कि उनमें इस्तेमाल किए गए फ्लेवरिंग स्थानीय नियमों का उल्लंघन करते हैं।
चूंकि समीक्षा के दायरे में आने वाले स्कॉच आयातों के मूल्य या मात्रा के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, इसलिए मौजूदा जांच के वित्तीय असर का अनुमान लगाना अभी संभव नहीं है। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय अधिकारी नए समझौते के तहत सीमा-शुल्क वर्गीकरण के नियमों की व्याख्या कैसे करते हैं और क्या यह व्याख्या पूरे उद्योग पर लागू होगी या केवल कुछ खास आयात श्रेणियों और खेपों तक सीमित रहेगी।